कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है। भारत में भी कोविड-19 के मामले बढ़ रहे हैं। लोगों के मन में रोज नए-नए सवाल उठ रहे हैं। यहां हम विश्व स्वास्थ्य संगठन, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और विशेषज्ञों द्वारा दी जा रही कोरोना से जुड़ी जानकारियों को आप तक पहुंचाएंगे।
किसी वायरस का टीका बनाने और एंटीबॉडी बनाने में क्या अंतर है?
जवाब : डॉ. स्कंद शुक्ला के अनुसार, ‘टीका उपचार नहीं है। वह रोग की रोकथाम करता है। वैक्सीन खुद कीटाणु को खत्म नहीं करती। वह मानव शरीर को ट्रेनिंग देती है। फिर हमारा इम्यून सिस्टम कीटाणु को मारता है। टीके का असर रोग से पहले होता है। टीका बन भी गया तो संक्रमित व्यक्ति पर इसका असर नहीं होगा। उनके लिए दूसरा तरीका अपनाते हैं, जिसे एंटीबॉडी कहते हैं। एक, संक्रमण होने के बाद शरीर में एंटीबॉडीज खुद बनने लगती हैं। दूसरा टीका लगाने के बाद ये शरीर में बनती हैं। बाद में प्रयोगशाला में भी इन्हें बना लिया जाता है।
नींद और कोरोना वायरस के बीच भी किसी प्रकार का संबंध देखने को मिला है क्या?
जवाब : कोविड-19 के कारण तनाव बढ़ने से लोगों को नींद की परेशानी हो रही है। रात में अच्छी नींद प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है। इसी समय शरीर खुद की मरम्मत करता है। जनवरी में अमेरिका में हुए अध्ययन के अनुसार, एक दिन की नींद की कमी भी संक्रमण से लड़ने की हमारी क्षमता पर असर डालती है। लंबे समय तक नींद न आने से त्वचा की सेहत और फेफड़ों पर बुरा असर पड़ता है। दोनों पर ही संक्रमण का असर पहले होता है। खुद को तनावमुक्त रखते हुए नींद को सामान्य पैटर्न पर लाने की कोशिश करें।
प्लाज्मा थेरेपी से क्या नुकसान हैं ?
जवाब : कोविड-19 संक्रमण से ठीक हो चुके व्यक्ति के शरीर में बनने वाली एंटीबॉडी को निकालकर दूसरों को देने की बात हो रही है। यही प्लाज्मा थेरेपी है। ठीक हो चुके व्यक्ति के खून से प्लाज्मा अलग करके दूसरे रोगी को दिया जाता है। जब किसी को प्लाज्मा चढ़ाया जाता है तो उसमें केवल एंटीबॉडीज नहीं होतीं, और भी कई रसायन होते हैं। ऐसे में प्रतिकूल असर भी हो सकते हैं। लैब में बनाए गए एंटीबॉडी शुद्ध होते हैं, वे प्लाज्मा की तरह कई रसायनों का मिश्रण नहीं होते। इसी वजह से वे ज्यादा बेहतर होते हैं।

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